जानें अर्ध कुम्भ की स्नान तिथियाँ, रीतियाँ और विधि

भारत में अनेक प्राचीन परम्पराएँ सदियों से चली आ रही हैं, जिनमें अर्ध कुम्भ का अपना एक अलग महत्व है। आध्यात्मिक और धार्मिक दृष्टिकोण से अर्ध कुम्भ मेले की अवधि के दौरान अनुष्ठान, स्नान एवं शुभ कर्म करने से व्यक्ति को विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है।  

प्रयागराज में होने वाले अर्ध कुम्भ मेला 2019 का शुभारंभ 14 जनवरी से होगा एवं यह 4 मार्च तक चलेगा। यहाँ विश्व भर से साधु-संत और श्रद्धालु, पवित्र स्नान के लिए एकत्रित होंगे। इस वर्ष होने वाले अर्ध कुम्भ में 3 ‘शाही स्नान’ के अतिरिक्त 5 ‘पर्व स्नान’ भी होंगे।

स्नान की तिथियाँ:
>14-15 जनवरी 2019: मकर संक्रांति (पहला शाही स्नान)
>21 जनवरी 2019: पौष पूर्णिमा
>31 जनवरी 2019: पौष एकादशी स्नान
>04 फरवरी 2019: मौनी अमावस्या (दूसरा शाही स्नान)
>10 फरवरी 2019: बसंत पंचमी (तीसरा शाही स्नान)
>16 फरवरी 2019: माघी एकादशी
>19 फरवरी 2019: माघी पूर्णिमा
>04 मार्च 2019: महा शिवरात्रि

मकर संक्रांति से शुरू होने वाला यह महापर्व अत्यंत पवित्र माना जाता है। श्रद्धालुजन पर्व की समाप्ति तक, नदी के किनारे अल्पाहार, स्नान, ध्यान व दान करके कल्पवास का व्रत रखते हैं। कल्पवास पौष माह के 11वें दिन से माघ माह के 12वें दिन तक रहता है। कल्पवास व्रत के कुछ नियम व कायदे हैं, जिनका व्रतधारी मनुष्य द्वारा पालन करना अनिवार्य है।  

विधि:
इस दौरान जो भी श्रद्धालु कल्पवास का व्रत रखता है, उसे महीने भर सादा जीवन व्यतीत करना पड़ता है।अल्प आहार के साथ-साथ ध्यान, तप और भक्तिपूर्वक सेवा का भाव भी मन में धारण करना होता है।व्रतधारियों की दिनचर्या सुबह गंगा-स्नान से प्रारंभ होती है और रात्रिकाल ज्ञान और भजन-कीर्तन जैसे आध्यात्मिक कार्यों के साथ समाप्त होती है। शास्त्रों में कल्पवास व्रतधारियों के लिए तप, होम, यज्ञ और दान जैसे कार्यों का उल्लेख है।मान्यताओं के अनुसार, इस दौरान व्रत रखने वालों को मोक्ष की प्राप्ति होती है।  

रीतियाँ:
अर्ध कुम्भ मेला में स्नान करने के पश्चात व्रतधारी को भगवान विष्णु एवं शिवजी के स्त्रोतों का पाठ करना चाहिए। इसके साथ ही सूर्य देव को मंत्रोच्चार के साथ तिल, पुष्प और जल से अर्ध्य देने की भी परम्परा है।  
अपने पितरों को जल,तिल व फूल सहित तर्पण करके यथा शक्ति अनाज से भरा घड़ा,तिल अादि का दान करना भी पुण्यदायी माना गया है।

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